Chhath Puja 2025: छठ पूजा में संध्या अर्घ्य के दिन क्यों भरी जाती है कोसी? जानें-विधि और महत्व
Chhath Puja: आज छठ महापर्व में संध्या अर्घ्य का दिन है. आज शाम के समय अस्ताचलगामी यानी डूबते सूर्य को अर्घ्य दिया जाएगा. संध्या अर्घ्य के अवसर पर कोसी भरी जाती है. आइए जानते हैं कि संध्या अर्घ्य के अवसर पर कोसी क्यों भरी जाती है?
Kosi Puja, Chhath Puja: लोक आस्था के महापर्व छठ का आज तीसरा दिन है. 26 अक्टूबर यानी बीते कल खरना का दिन था. खरना के पूजन के बाद व्रतियों ने विशेष प्रसाद ग्रहण किया. इसके साथ ही 36 घंटे का निर्जला व्रत शुरू हो गया, जिसका पारण 28 अक्टूबर यानी कल उगते सूर्य को अर्घ्य देने के बाद किया जाएगा.
आज छठ महापर्व में संध्या अर्घ्य का दिन है. आज शाम के समय अस्ताचलगामी यानी डूबते सूर्य को अर्घ्य दिया जाएगा. संध्या अर्घ्य के अवसर पर कोसी भरी जाती है. आइए जानते हैं कि संध्या अर्घ्य के अवसर पर कोसी क्यों भरी जाती है? इसके पीछे की वजह क्या है? साथ ही जानते हैं कोसी भरने की विधि और महत्व.
कोसी क्या होती है?
कोसी छठ पूजा की एक विशेष परंपरा है. जिसमें गन्नों से छतरीनुमा संरचना बनाई जाती है, जिसके बीच में मिट्टी का हाथी और कलश रख दिया जाता है. इसमें प्रसाद और पूजा की सामग्री रखी जाती है. साथ ही दीपक जलाया जाता है. कोसी छठ पूजा के तीसरे दिन यानी संध्या अर्घ्य के समय भरी जाती है.
क्यों भरी जाती है कोसी?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कोसी भरना आस्था और कृतज्ञता का प्रतीक माना जाता है. जब भक्तों की कोई मनोकामना पूरी हो जाती है, तो वो कोसी भरते हैं और छठी मैया के प्रति अपना आभार जताते हैं. लोग इस परंपरा का निर्वहन परिवार में सुख-समृद्धि, संतान की लंबी उम्र और अच्छे स्वास्थ्य के लिए भी करते हैं. किसी कठिन रोग से मुक्ति पाने के लिए भी कोसी भरी जाती है.
कोसी का महत्व
कोसी के घेरे को परिवारिक एकता और सुरक्षा कवच का प्रतीक माना जाता है, जबकि गन्नों से बनी छतरी छठी मैया की कृपा और आशीर्वाद का प्रतीक कही जाती है. ये पूजा में महिलाओं की आस्था दर्शाती है. महिलाएं ये पूजा परिवार की सुख-शांति और संतान की दीर्घायु के लिए करती हैं.
कोसी भरनी की विधि
पूजा के लिए सबसे पहले एक सूप या टोकरी सजाई जाती है.
उसके चारों ओर 5 या 7 गन्ने खड़े किए जाते हैं और छतरीनुमा संरचना बनाई जाती है.
ये संरचना जल, पृथ्वी, अग्नि, वायु, आकाश का प्रतीक मानी जाती है.
टोकरी के भीतर मिट्टी के हाथी पर सिंदूर लगाया जाता है. उसके ऊपर घड़ा बना रहता है.
इस घड़े में ठेकुआ, फल, मूली, अदरक आदि सूप में लगने वाला प्रसाद भरा जाता है.
घड़े और हाथी के उपर 12 दिये होते हैं.
सभी को घी और बत्ती डालकर जलाया जाता है.
ये 12 मास और चौबीस घड़ी का प्रतीक कही जाती है.
छठ पर्व के दौरान 36 घंटे का कठोर व्रत रखा जाता है, जो कि खरना पूजा के बाद शुरू होता है. 25 अक्टूबर को खरना पूजा संपन्न होने के बाद 36 घंटे का व्रत शुरू हुआ, जिसका समापन उषा अर्घ्य देने के बाद ही होता है. चलिए आपको बताते हैं छठ पूजा में संध्या और उषा अर्घ्य का टाइम, और छठ व्रत के नियम.
Chhath Arghya Time 2025: छठ पूजा के पहले दिन नहाय-खाय, दूसरे दिन खरना, तीसरे दिन संध्या अर्घ्य और चौथे दिन उषा अर्घ्य दिया जाता है. छठ पूजा में 36 घंटे का निर्जला व्रत खरना के बाद शुरू हो जाता है. यह कठोर व्रत 28 अक्टूबर को उषा अर्घ्य के साथ समाप्त होता है. छठ पूजा के दूसरे दिन व्रती शाम को सूर्यास्त के बाद विशेष प्रसाद तैयार करती हैं. यह प्रसाद व्रती का अंतिम भोजन होता है, क्योंकि इसे ग्रहण करने के बाद 36 घंटे का व्रत शुरू हो जाता है. खरना पूजा का मुहूर्त 26 अक्टूबर को शाम 5:30 बजे का था. ऐसे में छठ व्रत शुरू हुआ और जान लेते हैं संध्या और उषा अर्घ्य का समय क्या रहेगा.
“36 घंटे का निर्जला उपवास
छठ पूजा में 36 घंटे का कठोर और निर्जला उपवास रखा जाता है. यह उपवास खरना की खीर खाने के बाद शुरू होकर चौथे दिन सुबह सूर्य को अर्घ्य देने के बाद पारण करके खोला जाता है. 36 घंटे के उपवास के दौरान व्रती जल भी ग्रहण नहीं करते हैं, इसलिए इसे निर्जला उपवास कहा जाता है. इस उपवास का समापन चौथे दिन सूर्योदय के समय सूर्य को अर्घ्य देने और पूजा के बाद होता है.”
“छठ व्रत के नियम
अगर घर में किसी ने छठ व्रत किया है तो घर में लहसुन, प्याज, मांसाहार और मदिरा का सेवन नहीं करना चाहिए.
छठ व्रत के दौरान पलंग या चारपाई पर नहीं सोना चाहिए, जमीन पर चटाई बिछाकर ही सोना चाहिए.
छठ व्रत में महिलाएं 36 घंटे तक निर्जला (बिना पानी पिए) व्रत करना चाहिए.
तीसरे दिन शाम को डूबते सूर्य को और चौथे दिन सुबह उगते सूर्य को अर्घ्य देना चाहिए.
छठ व्रत का पारण उषा अर्घ्य के बाद ही करना चाहिए.”
छठ व्रत के नियम
अगर घर में किसी ने छठ व्रत किया है तो घर में लहसुन, प्याज, मांसाहार और मदिरा का सेवन नहीं करना चाहिए.
छठ व्रत के दौरान पलंग या चारपाई पर नहीं सोना चाहिए, जमीन पर चटाई बिछाकर ही सोना चाहिए.
छठ व्रत में महिलाएं 36 घंटे तक निर्जला (बिना पानी पिए) व्रत करना चाहिए.
तीसरे दिन शाम को डूबते सूर्य को और चौथे दिन सुबह उगते सूर्य को अर्घ्य देना चाहिए.
छठ व्रत का पारण उषा अर्घ्य के बाद ही करना चाहिए.